कविता : पेन्सनको सोच पालेकै हुँ !
● किरण पौड्याल / कुवेत
लो. से. आ. जस्तै कठोर, परीक्षा मैले पनि दिएकै हुँ
विकासको सुइँको नदिए पनि, सपना मैले बेचेकै हुँ
सोझा, साधा, लाटा जनता, ढुङ्ग्रोमा झ्वाम्मै हालेकै हुँ
चुनावी जात्रा नजिते पनि, नियुक्ति बलियो पाएकै हुँ |
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नागरिक भोकै जिय नै पनि, ५ तारे होटेल धाएकै हुँ
जनता नै सबै नांगिए पनि, आफ्नो त जोहो गरेकै हुँ
सडकमा अनाथ कापें नै पनि, महलमा रात काटेकै हुँ
शिक्षामा ताल्चा लागे नै पनि, आफ्नो त विदेश पठाकै हुँ ||
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हस्ताक्षर समेत नआए पनि, तलब र भत्ता बुझेकै हुँ
चप्पलै पहिला नलाए पनि, चिल्ला कारमा चढेकै हुँ
लाज नै मर्दो दबाई किनी, शोधभर्ना पुरै पाएकै हुँ
भन्दछ अनपढ कसले मलाई, यस्तामा शास्त्री गरेकै हुँ |
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शिक्षित, विद्वान, अनुभवी, माथि तान्डव नृत्य गरेकै हुँ
राणा र पंचे नभए पनि, राज्यको भोग गरेकै हुँ
लोकतन्त्र सर्वत्र लिलामी गरि, भरपुर रजाइँ गरेकै हुँ
संबिधान नदिने नियति ढाकी, हदम्याद पुरै तन्काकै हुँ ||
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पाँच वर्ष तान्न कसरत गर्दै, सिङ जूरो मैले खेलेकै हुँ
नाटक अनेक, चल खेल गर्दै, यहाँसम्म अलि धानेकै हुँ
निबृतिभरण, पेन्सन मिठो, मैले नि खान खोजेकै हुँ
अन्तिम ईच्छा केवल एक, पेन्सनको सोच पालेकै हुँ |





